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Monday, September 20, 2010

कुछ मुक्तक

हिन्दी

हिन्दी है राजनीति की शिकार हो गयी।
धारा संविधान की बेकार हो गयी ।
सोते रहे रहनुमा कुर्सी के मोह में--
है राष्ट्रभाषा संसद में लाचार हो गयी ।

हिन्दी का पोर-पोर बिंधा घावों से ।
हो गया आहत ह्रदय बिडम्बनाओं से ।
कलम के सिपाहियों खामोश मत रहो --
है राष्ट्र भाषा सिसक रही वेदनाओं से ।

अखबार

डर जाये जो आतंक से कलमकार नहीं है ।
मोड़े जो मुख सत्य से पत्रकार नहीं है ।
जनता के दुखदर्द को जो लिख नहीं पाया--
हो कुछ भी वो मगर वो अखबार नहीं है ।